उदयप्रकाश के ‘झूठ’ और ‘सच’

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मुझे याद है कई लेखकों, कई किताबों की वे उन दिनों बेहद चर्चा किया करते थे. दो किताबों का मैं खास तौर पर ज़िक्र करना चाहूँगा. एक उपन्यास था सर्बियन लेखक मिलोराद पेविक का ‘लैंडस्केप पेंटेड विथ टी’, इसका एक संवाद वे अक्सर सुनाया करते थे जिसका मानी कुछ इस तरह था कि कम्युनिस्ट पार्टी कुछ लोगों के लिए घर की तरह होती है जो वहां आते हैं और वहीं के होकर रह जाते हैं, कुछ लोगों के लिए दुकान की तरह होती है. हमारे यहां कम्युनिस्ट पार्टियों से मोहभंग की शुरुआत तब नहीं हुई थी, लेकिन उनके तौर-तरीके को लेकर सवाल उठाये जाने लगे थे. उन दिनों यह पंक्ति वे अक्सर सुनाया करते थे. मैं आज तक इससे गहरे प्रभावित हूँ. एक और उपन्यास जिसका मैं खास तौर पर उल्लेख करना चाहता हूँ वह है इटैलियन लेखक इतालो काल्विनो का ‘इफ ऑन ए विंटर्स नाइट ए ट्रैवेलर’. बहुत दिलचस्प शिल्प है इस उपन्यास का. एक बुकबाइंडर के यहाँ गलती से कई किताबों के अलग-अलग अध्याय एक साथ एक किताब के रूप में तैयार हो जाते हैं. अभी हाल में ही मैं जब तमिल लेखक चारु निवेदिता के उपन्यास ‘जीरो डिग्री’ का हिंदी अनुवाद कर रहा था तो मुझे काल्विनो के इस उपन्यास का ध्यान आया. ‘जीरो डिग्री’ भी इसी शैली का उपन्यास है. तीन अलग-अलग लेखकों के लिखे हुए उपन्यासों के अध्याय एक साथ बाईंड हो जाते हैं. उदयप्रकाश न सिर्फ इन उपन्यासों को पढ़ने के लिए देते थे बल्कि बताते भी थे कि किस तरह से ये उपन्यास आधुनिक उपन्यास-परंपरा से अलग हैं, किस तरह इनका शिल्प अलग है और इनका क्या महत्व है?

वैसे सिर्फ इन्हीं दो उपन्यासों के बारे में नहीं और भी बहुत सारे उपन्यासों, किताबों के बारे में वे बताते थे. लेकिन अगर ये दो उपन्यास खास तौर पर याद हैं तो इसका एक कारण है. असल में ये दोनों उपन्यास मुझसे गुम हो गए थे जिसके लिए उदय जी ने मुझे कभी माफ नहीं किया. हुआ यह कि उन दिनों मेरा एक दोस्त था नीरज पांडे, जो बाद में फिल्म-निर्देशक के रूप में प्रसिद्ध हुआ. मैं मानसरोवर हॉस्टल में रहता था और वह पास में ही तिमारपुर में.  अक्सर मेरे पास नई-नई किताबों की खोज में आया करता था. वह दिल्ली के एक प्रोडक्शन हाउस में काम करता था और कहता था कि वह किसी ऐसी कहानी पर फिल्म बनाना चाहता है जो सबसे अलग हो. उन दिनों मैं उदयप्रकाश के जादू की गिरफ्त में था. उनके जैसा लेखक जिस उपन्यास की इतनी तारीफ करे उससे महान मैं किसी और चीज़ को मान ही नहीं सकता था. मैंने एक दिन उसके सामने मिलोराद पेविक और इतालो काल्विनो के उपन्यासों की चर्चा की और बताया कि हिंदी के सबसे बड़े लेखक उदयप्रकाश ने मुझे बताया है कि ये दोनों दुनिया के बेहतरीन उत्तर-आधुनिक उपन्यास हैं. वह यह कहते हुए मुझसे उपन्यासों को मांगकर ले गया कि कल फोटोस्टेट करके मुझे लौटा देगा.

वह कल फिर नहीं आया. वह हर दूसरे-तीसरे दिन मेरे पास आता था. लेकिन जब हफ्ते भर नहीं आया तो मैं उसके तिमारपुर उसके कमरे पर गया. पहुँचने पर उसके मकान मालिक ने बताया कि वह तो मुंबई(तब बम्बई) चला गया. अचानक उसको वहां किसी टीवी सीरियल में असिस्टेंट डाइरेक्टर का काम मिल गया और वह चला गया. मेरे करीब १५ उपन्यास उसके पास थे. मुझे उसके जाने का दुःख नहीं था, दुःख इस बात का हुआ कि वह बिना मेरी किताबों को लौटाए चला गया. और तो और उदय जी के उपन्यास… अब क्या होगा. तब मेरे पास इतने पैसे भी  नहीं होते थे कि किताब खरीद कर दे सकूँ. फिर मिलोराद पेविक का उपन्यास कहां से लाता? वह तो इण्डिया में मिलता भी नहीं था. उदयप्रकाश ने कई बार बताया था कि अमेरिकी हिंदीविद रॉबर्ट ह्युक्सडेट उनके लिए यह उपन्यास खास तौर पर अमेरिका से लेकर आये थे. वहां कम्युनिस्ट पार्टियों के अंतर्विरोधों की चर्चा जब भी होती थी इस उपन्यास को उदाहरण की तरह पढा जाता था. उपन्यासों के गायब होने का यह प्रसंग ऐसा हुआ कि मैं उदयप्रकाश को देखते ही भाग खड़ा होता. एक बार वे हॉस्टल भी आये अपने उपन्यास मांगने. मैंने कहा कि मेरा एक दोस्त ले गया है, मैं अभी साकेत जा रहा हूँ उसके पास. उपन्यास ले आऊंगा, कल आपको ज़रूर पहुंचा दूँगा. वह कल कभी नहीं आया.

प्रसंगवश, मिलोराद पेविक का उदय जी पर गहरा प्रभाव रहा है. अपने कई लेखों, कई साक्षात्कारों में उन्होंने इस उपन्यास की चर्चा की है, एक साक्षात्कार में उन्होंने यह भी कहा था कि वे पेविक के उपन्यास का अनुवाद कर रहे हैं, जो जल्दी ही हिंदी में प्रकाशित होने वाला है. कई साल हो गए… अभी तक तो प्रकाशित नहीं हुआ है…

मैं याद करता हूँ तो पाता हूँ के वे दिन उदय जी के रचनात्मक उत्कर्ष, कथाकार के रूप में बढ़ती लोकप्रियता के दिन थे. उनका संग्रह आया था ‘और अंत में प्रार्थना’, जो मेरे हिसाब से उनका सर्वश्रेष्ठ कहानी संग्रह है. मैंने पहली बार किसी किताब की समीक्षा लिखी थी तो उसकी. हालाँकि वह प्रकाशित नहीं हो पाई. उन दिनों राजकिशोर ‘दूसरा शनिवार’ नाम से पत्रिका निकालते थे. उसमें छपने के लिए दी. उन्होंने किसी और किताब पर लिखने की सलाह देते हुए वह समीक्षा रख ली थी. कुछ दिनों बाद ‘दूसरा शनिवार’ का प्रकाशन बंद हो गया. मेरी समीक्षा की प्रति भी मेरे पास नहीं रही.

उन्हीं दिनों उनके लंबे बेकारी के दिनों की शुरुआत हुई थी. ‘कृषि कथा’ सीरियल का प्रोड्यूसर उनको लगातार दुस्स्वप्नों की दुनिया में ले जा रहा था, हिंदी में कभी उनकी कहानियों पर चोरी के आरोप लगाये जाते, कभी कुछ और. उन्हीं दिनों उनकी कहानियों में एक नया मोड़ आया. मुझे अच्छी तरह याद है. एक दिन दोपहर में जब मैंने उनको फोन किया तो यह कहते हुए बुलाया कि कुछ जरूरी काम है आपसे. मैं पहुंचा तो उन्होंने हाथ से लिखे करीब ४० पेज मुझे दिए. तीन फोटोप्रतियाँ थी. वह उनकी नई कहानी ‘पॉल गोमरा का स्कूटर’ थी. मुझे देते हुए उन्होंने कहा वे चाहते हैं कि तीन अलग-अलग लोगों को उनकी वह कहानी पढ़ने के लिए दे आऊँ- मनोहर श्याम जोशी, हंसराज कॉलेज में अंग्रेजी के प्राध्यापक कृष्ण गोपाल वर्मा और उत्तर-आधुनिक आलोचक के रूप में विख्यात हो रहे सुधीश पचौरी. मैंने तीनों को घर जाकर उस कहानी की छायाप्रति दी. बाद में लेने भी गया. यह पूछने भी कि उनको कहानियां कैसी लगीं. मुझे अच्छी तरह याद है कि तीनों की प्रतिक्रियाओं में कुछ स्पष्टता नहीं थी, बल्कि कुछ नकारात्मक भाव ही था. लेकिन उदय जी ने उनकी प्रतिक्रियाओं पर कुछ ध्यान नहीं दिया. वे ‘पॉल गोमरा का स्कूटर’ को लेकर खासे उत्साहित थे और उसकी लोकप्रियता को लेकर आश्वस्त भी.

मुझे याद है उसका एक पाठ कवि देवीप्रसाद मिश्र के घर पर भी हुआ था. गर्मी की एक दोपहर मैंने उसका पाठ किया था. देवीप्रसाद मिश्र, उनकी चित्रकार पत्नी हेम ज्योतिका और उदयप्रकाश ने तरबूज खाते हुए उस लंबी कहानी के पाठ का आनंद लिया था. जैसे ही पाठ खत्म हुआ देवी प्रसाद मिश्र बजाय कोई प्रतिक्रिया देने के अपनी एक लिखी जा रही कहानी के बारे में बताने लगे थे, जो एक चिड़िया को लेकर थी जो लेखक के घर में आकर घोंसला बना लेती है. किसी ने भी  उस कहानी को लेकर उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया नहीं दी. लेकिन उदय जी कहते एक बार छपने दीजिए, फिर देखिएगा. जब इण्डिया टुडे के साहित्य वार्षिकांक में वह कहानी छपी तो वही हुआ जिसको उदय प्रकाश को अंदाजा था. मैंने तब भी इस बात को समझा था और आज भी कहता हूँ कि हिंदी कहानी का वह एक टर्निंग पॉइंट है. उस कहानी के माध्यम से उदयप्रकाश ने एक ऐसा शिल्प विकसित किया जिसके माध्यम से हिंदी ‘पब्लिक स्फेयर’ के पतन की कथा कही जा सके, जिसमें प्रतिभा का नहीं जोड़-तोड़ का खेल चलता है, सत्ता की पूजा होती है.

‘कृषि-कथा’ के लिए शोध करते हुए उनको वारेन हेस्टिंग्स के बारे में पता चला. ‘नन्दकुमार का मुकदमा’ के बारे में पता चला. वे उन दिनों मानसरोवर हॉस्टल में मुझसे मिलने अक्सर आते थे. जब भी मिलते वारेन हेस्टिंग्स के बारे में बातें करते. कहते वे उनके ऊपर कहानी लिख रहे हैं. बाद में उनकी कहानी आई ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड’ तो मैं हतप्रभ हो गया था. तब भी और आज भी उनकी सबसे जादुई कहानी मुझे वही लगती है. वह उनकी रचनात्मकता का शिखर था और शायद लोकप्रियता का भी. उसके बाद मैं उनसे जब मिलता बीच में एक कथाकार के रूप में उनकी ऊंचाई आड़े आ जाती.

मेरा शोध पूरा हो गया. मैंने आज तक उनको देखने के लिए नहीं दिया. वह उनकी कहानियों के हिसाब से कमतर है. जिस तरह की ऊंचाई, जिस तरह का वितान उनकी कहानियां रचती हैं, मेरा विश्लेषण उसके उस उत्कर्ष को समझ-समझा नहीं पाता मैं पूरी ईमानदारी से कहना चाहता हूँ. इसलिए मैंने हमेशा अपने शोध को छिपाया, आज भी छिपाता हूँ. बरसों हो गए उनसे मिले, उनकी कहानियों का वैसा आकर्षण भी मेरे लिए अब नहीं रहा लेकिन हम युवा लेखकों के लिए वे ऐसे शिखर हैं जिसकी ऊंचाई हमें बड़ी उम्मीदों से भर देती है, लेखकीय संभावनाओं से भर देती है… और उदयप्रकाश बनने की महत्वाकांक्षा से भर देती है.

उस उदयप्रकाश के जैसा जिसे मैंने कॉलेज के दिनों में एक झूठ के माध्यम से जाना था. जो आज भी हिंदी कहानी का सबसे बड़ा सच बन कर मौजूद है. सच और झूठ की चौहद्दी को घुला-मिला देने वाले लेखक के रूप में.

प्रभात रंजन

 

प्रभात रंजन जी का विशेष आभार । लेख प्रतिलिपि साहित्यिक पत्रिका के ब्लॉग विशेषांक में भी प्रकाशित हो चुका हैं । )

 

प्रभात रंजन - परिचय

 

Fiction writer, translator and editor, Prabhat Ranjan (b. 1970) teaches Hindi at Zakir Husain Evening College, DU. Prior to this he has worked with the Hindi daily of the Indian Express group, Jansatta, as Assistant Editor and also edited a few issues of Mahatma Gandhi Antarrashtriya Hindi Vishwavidyalaya, Wardha’s magazine Bahuvachan.

He has published two collections of short stories Janaki Pul and Bolero Class and has translated Vikram A. Chandra’s novel Srinagar Conspiracy and Anne Frank’sDiary into Hindi. His other publications include Marquez ki Kahani, a biography of Gabriel Garcia Marquez, Neem ka Ped, a novelization of Rahi Masoom Raza’s TV series, Television Lekhan (with Asghar Wajahat) and Anchor Reporter (with Punya Prasoon Joshi). He also edited, with Ashok Vajpeyi and Apurvanand, a collection of Sumitranandan Pant’s poetry, Svachchand.

Janaki Pul, the story, won him the Sahara Samay Katha Prize (2004). In 2007, he was awarded the Premchand Samman.  He runs one of the most acclaimed and popular online spaces in Hindi, Janaki Pul.

 

 

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